करंट अफेयर्स
IAS नेहा ब्याडवाल, जिन्हें लेकर सोशल मीडिया पर बवाल
IAS नेहा ब्याडवाल हाल ही में अपनी उम्र और UPSC की तैयारी के तरीके को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गई हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि उन्होंने बहुत कम उम्र में (22-24 साल) UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली थी और अपनी तैयारी के दौरान लगातार तीन साल तक मोबाइल फोन और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखी थी।
सोशल मीडिया पर विवाद की शुरुआत तब हुई जब एक यूजर ने नेहा की फोटो शेयर करते हुए लिखा कि वे 24 साल में देश की सबसे युवा महिला IAS ऑफिसर बनीं और उन्होंने 3 साल तक फोन का इस्तेमाल नहीं किया। इस दावे पर कई यूजर्स ने सवाल उठाए कि आज के डिजिटल युग में, जब सरकारी कामों के लिए भी मोबाइल जरूरी है, तीन साल तक बिना फोन के रहना क्या वास्तव में संभव है या यह एक खास तरह का ‘UPSC-prep cult’ बन गया है?
कुछ यूजर्स ने UPSC की तैयारी के इस ‘कल्चर’ की आलोचना की, यह कहते हुए कि जो लोग केवल पढ़ाई में डूबे रहते हैं, वे असल भारत को नहीं समझ पाते और बाद में वही जनता पर शासन करते हैं। वहीं, कई लोगों ने नेहा का समर्थन किया और कहा कि इतनी मेहनत और समर्पण हर किसी के बस की बात नहीं होती; यह उनकी सफलता का राज़ है।
मुख्य बिंदु:
- नेहा ब्याडवाल ने 2021 में 22-24 साल की उम्र में UPSC परीक्षा पास की और 569वीं रैंक हासिल की।
- उन्होंने दावा किया कि तीन साल तक मोबाइल फोन और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाई, जिससे उनकी तैयारी में फोकस रहा।
- इसी दावे को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई—कुछ ने इसे अनुशासन और समर्पण बताया, तो कुछ ने इसे ‘कल्ट’ मानसिकता और जमीनी हकीकत से कटाव करार दिया।
- नेहा अभी गुजरात कैडर में IAS हैं और भरुच में असिस्टेंट कलेक्टर के पद पर कार्यरत हैं।
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आइए जानते हैं ,भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया था?
भारत का पहला स्वतंत्र केंद्रीय बजट 26 नवंबर 1947 को आर.के. शनमुखम चेट्टी ने पेश किया था।
ब्रिटिश काल का पहला बजट
भारत में आधुनिक बजट की शुरुआत 1860 में हुई, जब जेम्स विल्सन ने लंदन में ब्रिटिश संसद के समक्ष इसे प्रस्तुत किया। यह 1857 के विद्रोह के नुकसानों की भरपाई के लिए था।
स्वतंत्र भारत का पहला पूर्ण बजट
26 नवंबर 1947 का बजट अंतरिम था, जबकि लोकतांत्रिक भारत का पहला पूर्ण बजट 28 फरवरी 1950 को जॉन मथाई ने पेश किया।
शाम को पेश होने की परंपरा
आजादी के बाद 1999 तक बजट शाम 5 बजे पेश होता था, जो ब्रिटिश समय के अनुसार इंग्लैंड में सुबह होने के कारण था। 1999 में यशवंत सिन्हा ने पहली बार सुबह 11 बजे इसे प्रस्तुत किया
करंट अफेयर्स
आइए जानते हैं कि भारत के किस शहर को कहा जाता है ‘इत्र की राजधानी’
भारत का शहर कन्नौज (उत्तर प्रदेश) ‘इत्र की राजधानी’ के नाम से जाना जाता है।
यह शहर प्राकृतिक फूलों से बने पारंपरिक अत्तर के उत्पादन के लिए सदियों से प्रसिद्ध है।
विशेषताएं
- कन्नौज में 200+ इत्र भट्टियाँ हैं, जो गुलाब, चमेली आदि से इत्र बनाती हैं।
- कन्नौज अत्तर को GI टैग मिला है, जो इसकी प्रामाणिकता सुनिश्चित करता है
बनाने की प्रक्रिया
- सामग्री: ताजे फूल (गुलाब, चमेली, बेला आदि) 50-60 किलो, चंदन का तेल (बेस ऑयल) और पानी।
- चरण: तांबे के बड़े बर्तन (डेग) में फूल डालें, पानी मिलाकर चिकनी मिट्टी से सील बंद करें। धीमी आंच लगाएं ताकि भाप बने।
- भाप को चोंगा (बांस/तांबे की नली) से ठंडे पानी वाली नांद में रखे भभका (रिसीवर) में भेजें, जहाँ संघनन होकर सुगंधित तेल अलग हो।
समय और पैकिंग
प्रक्रिया में 8-12 घंटे लगते हैं (मिट्टी इत्र में 2-3 दिन)। इत्र को छानकर कांच/पीतल की बोतलों में भरते हैं। यह पूरी तरह प्राकृतिक और बिना केमिकल का होता है।
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जानिए कैसा है भारत का पहला AI आंगनवाड़ी? ऐसे होती है डिजिटल पढ़ाई
भारत का पहला AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित आंगनवाड़ी महाराष्ट्र के नागपुर जिले के हिंगना तहसील के वडधामना गांव में खुला है। इसे ‘मिशन बाल भरारी’ पहल के तहत नागपुर जिला परिषद द्वारा शुरू किया गया है। इस AI आंगनवाड़ी को हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्घाटित किया। यह देश में ग्रामीण डिजिटल शिक्षा में एक बड़ा परिवर्तन लाने की कोशिश है।
यहां के बच्चों की पढ़ाई अब पारंपरिक चॉक-स्लेट की बजाय पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है – कक्षा में स्मार्टबोर्ड, वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट जैसे अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं। बच्चे AI-सक्षम स्मार्टबोर्ड के जरिए रंग-बिरंगे, इंटरेक्टिव कंटेंट के साथ गिनती, वर्णमाला, रंग और कहानियां सीखते हैं। शिक्षक बच्चों की प्रगति को ट्रैक करने के लिए AI-सिस्टम की मदद लेते हैं, जिससे हर बच्चे की व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार सामग्री और गतिविधियां मिलती हैं। यह केंद्र बच्चों में डिजिटल लर्निंग की आदत शुरू से ही डाल रहा है, जिससे उनका स्किल बेस भविष्य के लिए मजबूत बनता है।
यह AI आंगनवाड़ी सुविधाओं के मामले में प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रही है — यहां बच्चों का नामांकन दोगुना हो गया है और डिजिटल गैप तेजी से कम हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई अब आधुनिक, रंगीन और टेक्नोलॉजी से लैस माहौल में चल रही है, जो ग्रामीण शिक्षा की गुणवत्ता और आकर्षण दोनों को एक नई ऊंचाई देता है।
संक्षिप्त में:
- अब चॉक-स्लेट की जगह स्मार्टबोर्ड व डिजिटल टूल्स।
- VR हेडसेट, AI-आधारित प्रगति ट्रैकिंग, रंगीन व इंटरेक्टिव कंटेंट।
- बच्चों की उपस्थिति व नामांकन में भारी वृद्धि।
- डिजिटल लर्निंग गांवों तक पहुंची, जिससे शिक्षा और ज्यादा रोचक व प्रभावशाली हुई है।
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